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शिवलिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा ऊपरी भाग में प्रणव संज्ञक महादेव रुद्र विराजमान है। शिवलिंग वेदी महादेवी पार्वती अम्बिका हैं जो सत, रज, तम तीनों गुणों से तथा त्रिदेवों से युक्त हैं। जो भी मनुष्य इस वेदी के साथ शिवलिंग की पूजा करता है, उसने सबका पूजन कर लिया।
लिंगपुराण में एक प्रसंग है कि ब्रह्माजी के अनुसार इस चराचर जगत की रक्षा के लिए लिंग पूजन ही सहज मार्ग है। विश्वकर्मा ने ब्रह्माजी की आज्ञा से अपने अधिकार के अनुरूप विविध प्रकार के लिंगों का निर्माण करके देवताओं को दिया। सर्वप्रथम विष्णु ने नीलकांतमणि से निर्मित लिंग की पूजा की। इंद्र ने पद्मरागमणि, कुबेर ने सुवर्ण, विश्वदेवों ने रजत, वसुओं ने चंद्रकांतमणि, वायु ने आरकूट (पीतल), अश्वनी कुमारों ने मिट्टी, राजा वरुण ने स्फटिक, आदित्य ने तांबा आदि से निर्मित लिंग की पूजा कर शिव को प्रसन्न किया। मनुष्य को स्थापन क्रम में पाषाण, रत्न, धातु, काष्ठ, पार्थिव, बाण आदि से निर्मित लिंग की पूजा करना शुभ कारक होता है। शिव महात्म्य में इन विविध प्रकार के लिंगों के पूजन के फल की चर्चा की गई है। रत्न निर्मित लिंग की पूजा लक्ष्मी प्रदान करने वाली है। पाषाण निर्मित लिंग की पूजा समस्त सिद्धियों को देने वाली है। धातु निर्मित लिंग की पूजा प्रत्यक्ष श्री को प्रदान करती है। काष्ठ निर्मित लिंग की पूजा भोग -सिद्धि प्रदान करती है। पार्थिव शुभ लिंग अभीष्ट को प्रदान कर सिद्धि देता है। इसमें पाषाण लिंग सर्वोत्तम कहा गया है। इस प्रकार हम इन विविध प्रकार के लिंगों की स्थापना व विधान पूर्वक पूजन कर दिव्य फलों को प्राप्त कर अपने जीवन को सुखमय व आनंदमय बना सकते हैं।
-नितेश उपाध्याय, श्रीबैकुंठनाथ पवहारि संस्कृत महाविद्यालय

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