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शिव शब्द का व्यापक अर्थ कल्याण को दर्शाता है। वास्तव में शिव ही कल्याणकारी हैं। शिवलिंग के रूप में इनके निर्गुण निराकार स्वरूप की पूजा की जाती है। शिव लिंग का स्वरूप ही ब्रह्म का द्योतक है। पुराणों के अनुसार शिवलिंग में सभी देवता अवस्थित हैं, साथ ही शिव- शक्ति का युग्म स्वरूप होने से शिवलिंग सर्व पूज्य है। शिवलिंग की पूजा पुराण काल से प्राप्त होती है। शिवलिंग में लिंग वेदी के रूप में महादेवी पार्वती और लिंग के रूप में साक्षात महेश्वर प्रतिष्ठित रहते हैं। यहां तक कि यह भी प्राप्त होता है कि लिंग पूजन से आत्म सिद्धि की प्राप्ति होती है, साथ ही पुराणों में कहा गया है कि सभी दैत्य, दानव व देवता लिंगार्चन से ही प्रतिष्ठित होते हैं। लिंग पुराण में कहा गया है कि कलयुग में शीघ्र प्रसन्न होने वाले यदि कोई देवता हैं तो वह शिव ही है।
शिवलिंग पर चढ़े नैवेद्य के दर्शन मात्र से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और उनका भक्षण करने से करोड़ों करोड़ों पुण्य का अर्जन होता है। लोक में यह प्रचलित है शिव को चढ़ाएं नैवेद्य का भक्षण नहीं किया जाता है। इसमें भी शास्त्र हमें निर्देशित करते हैं। कुछ ही शिव लिंग इस प्रकार के होते हैं जिन पर चढ़ाया गया नैवेद्य ग्रहण नहीं कर सकते, जिनमें खासतौर से स्थापित लिंग हैं। जो स्वयंभू लिंग होते हैं, रजत, स्वर्ण या स्फटिक अथवा बाड़ आदि के लिंग पर जो भी नैवैद्य अर्पित किया जाता है, उसे ग्रहण कर सकते हैं। शालिग्राम शिला पर अर्पित किया हुआ नैवेद्य भी ग्रहण के योग्य है।
-विवेक उपाध्याय, सहायक विभागाध्यक्ष, ज्योतिष, श्री वैकुण्ठ नाथ पवहारी संस्कृत महाविद्यालय, वैकुण्ठ पुर, देवरिया
Keywords: shiv, dharm

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