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शिव परम वैभव को प्राप्त उस पवित्र अग्नि की ज्वाला के समान हैं जिसमें काम, क्रोध, मोह, अहंकार, लोभ आदि सभी प्रकार के विकार जाकर भस्म हो जाते हैं और मनुष्य निर्मल होकर निर्विकार चैतन्य अवस्था को प्राप्त होता है, अर्थात उस परम वैभव को प्राप्त करता है जो शिव को प्राप्त है। शिव अपने किसी भक्त को अपने से रत्ती भर भी कम नहीं देखना चाहते, बिल्कुल अपने जैसा हो जाने का उपाय बताते हैं। 'विज्ञान भैरव तंत्रÓ उनकी अमूल्य देन है। अब इसे एक पुस्तक के रूप में संग्रहित कर दिया गया है, हालांकि यह पुस्तक भी बहुत कम स्थानों पर देखने को मिलती है। इस पुस्तक में परम वैभव प्राप्त करने की 112 विधियां बताई गई हैं। शिव ने पार्वती को यह विधियां बताई हैं। ये सभी विधियां ध्यान की हैं। पूरी मनुष्य जाति में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जिसपर इसमें से कोई न कोई विधि कार्य न करती हो। अर्थात सभी प्रकार के मनुष्य इन 112 विधियों के भीतर समाहित हो जाते हैं। जिसने इन विधियों का प्रयोग किया उसने परम वैभव को प्राप्त किया। जब परम वैभव अर्थात परमात्मा मिलता है तो संसार खुद ही हाथ से छूट जाता है। यह वैसे ही है जैसे हम कंकड़-पत्थर हाथों में लिए हों और कोई हमें स्वर्ण दे दे, उस समय कंकड़-पत्थर हाथ से छूट जाएंगे, ऐसे ही संसार छूट जाता है। जब संसार हाथ से छूटता है तो परम प्रेम जिसे परमात्मा कहते हैं, शिव कहते हैं, वह उतरता है और जीवन धन्य हो जाता है। जीवन सार्थक हो जाता है। जिसके लिए हमें मनुष्य जन्म मिला, वह कार्य पूर्ण हुआ। भगवान शिव की कृपा यही है कि मनुष्य, मनुष्य न रहकर परमात्मा हो जाता है, शिव हो जाता है। इसलिए शिव से संबंध बनाना सब कुछ मिटाने का निमंत्रण देना है। बहुत साहस है तो ही शिव से संबंध बनाओ। यह भी जान लें कि जो मिटता है, वह सपना है, जो उपस्थित होता है, वह शाश्वत है।
-स्वामी आनंद असीम, ओशो संन्यासी

Keywords: shiv, dharm

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