0
भारतीय संस्कृति में सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार को त्रिदेवों- ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव से जोड़कर चित्रित किया गया है। शिव, शक्ति के ही आदि रूप हैं। शिव आदि और अनश्वर हैं। ईश्वर का नील लोहित स्वरूप ही शंकर स्वरूप है। पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में स्वीकार किया। प्रेत, पिशाच, भैरव, विनायक, जातुधान, डाकिनी, शाकिनी, कृष्मांड, बेताल, योगिनी आदि शिव के गण अर्थात अनुचर हैं। शिव अति शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं, इसीलिए उन्हें आशुतोष कहा गया है। श्रावण मास, श्रवण नक्षत्र और सोमवार से भगवान भोलेनाथ का गहरा संबंध है। श्रावण मास में भगवान शिव का जलाभिषेक करना चाहिए। भगवान शिव ने स्वयं अपने मुख से सनत कुमारों से कहा है कि मुझे बारह महीनों में श्रावण मास विशेष प्रिय है। इस काल में भगवान शिव, श्रीहरि के साथ मिलकर पृथ्वी पर लीला करते हैं। इस मास की विशेषता है कि इसका कोई भी दिन शून्य नहीं देखा गया है। इस महीने में गायत्री मंत्र, शतरुद्रि पाठ, पुरुष सूक्त का पाठ एवं पंचाक्षर, षडाक्षर आदि शिव मंत्रों व नामों का जप विशेष फल देने वाला है। यह मात्र श्रवण मात्र से सिद्धि प्रदान करने वाला है, इसलिए इसे श्रावण कहते हैं। श्रावण मास व श्रवण नक्षत्र के स्वामी चंद्रमा और चंद्रमा के स्वामी भगवान शिव हैं।
-सुधाकर तिवारी, धर्मवेत्ता

Keywords: shiv, savan

नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गूगल खोज से ली गई हैं, यदि किसी फोटो पर किसी को कॉपीराइट विषय पर आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगी।

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top