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शिव के व्यक्तित्व में हमने समस्त शक्तियों को स्थापित किया है। अमृत है उनका जीवन। मृत्युंजय हैं वह, लेकिन जहर उनके कंठ में है। इसलिए हम उनको नीलकंठ कहते हैं। जहर पी गए हैं। अमृत उनकी अवस्था है, मर वह सकते नहीं, शाश्वत हैं। शाश्वत जो है, वही जहर पी सकता है। जो मरणधर्मा है, वह जहर कैसे पिएगा? यह जहर तो सिर्फ प्रतीक है। शिव के व्यक्तित्व में जिस-जिस चीज को हम जहरीली कहें, वे सब उनके कंठ में हैं। कोई स्त्री उससे विवाह करने को राजी नहीं थी। कोई पिता राजी नहीं होता था। उमा का पिता भी बहुत परेशान हुआ था कि यह लड़की ऐसा वर को खोज लाई, जो बेबूझ था, जिसके बाबत तय करना मुश्किल था कि वह क्या है? परिभाषा होनी कठिन थी। क्योंकि वह दोनों ही थे। बुरे से बुरा उनके भीतर था। भले से भला भी उनके भीतर था, और जब बुरा भीतर होता है तो हमारी आखें बुरे को देखती हैं, भले को नहीं देख पातीं। क्योंकि बुरे को हम खोजते रहते हैं। कहीं भी बुरा दिखाई पड़े तो हम तत्काल देखते हैं, भले को तो हम बामुश्किल देख पाते हैं। तो अगर लड़की के पिता को शिव में बुरा ही बुरा दिखाई पड़ा हो, तो कोई हैरानी की बात नहीं है। लेकिन भीतर जो श्रेष्ठतम, शुद्धतम शुभत्व है, वह भी था और दोनों इतने संतुलित थे कि वह जो व्यक्ति था, दोनों के पार हो गया था।
जब बुराई और भलाई पूर्ण संतुलन में होती है तो संत पैदा होते हैं। संत भले आदमी का नाम नहीं है। भले आदमी का नाम सज्जन है। बुरे आदमी का नाम दुर्जन है। भलाई और बुराई, दोनों को जो इस ढंग से आत्मसात कर ले कि वे दोनों संतुलित हो जाएं और एक-दूसरे को काट दें, बराबर मात्रा में हो जाएं तो दोनों के पार जो व्यक्तित्व पैदा होता है, वह संत है। संत एक गहन संतुलन है। शिव वही हैं।
-स्वामी जगत नरायन भारती, ओशो संन्यासी

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