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ब्राह्मण शिलाद द्वारा शिव की एक हजार दिव्य वर्ष की तपस्या के फलस्वरूप भगवान शिव के सम्मुख होने पर शिलाद ने अयोनिज व मृत्युहीन पुत्र की कामना की, तब सपरिवार गणों सहित शिव ने नन्दी नाम से अयोनिज पुत्र के रूप में अवतरित होने का संकेत किया। तत्पश्चात भगवान शिव का नन्दी के रूप में प्राकट्य हुआ। नन्दी अपने पिता शिलाद के साथ उनकी कुटी में रहने लगे। शिलाद ने उनका जातकर्म आदि संस्कार करवा कर उन्हें वेदादि का सांगोपांग उपदेश दिया। उसी समय लगभग सात वर्ष पूर्ण होने पर परमेश्वर की आज्ञा से मित्र व वरुण नामक दो दिव्य मुनिश्रेष्ठ आश्रम में रहने आए। वे मुनिश्रेष्ठ नन्दी की तरफ बार-बार देख कर कहने लगे कि ये सभी शास्त्रों के ज्ञान में पारंगत तो होगा किन्तु यह बालक अल्प आयु वाला है। इसकी आयु आज से मात्र 1 वर्ष की है। इस बात को सुनकर शिलाद सहित सभी आश्रमवासी बहुत दुखी हुए व स्वयं शिलाद आहत हो पुत्र की रक्षा के लिए जप आराधना करते हुए दस हजार दूर्वा से त्रयंबक मंत्र से आहुति दे महादेव को संतुष्ट किया। शिव ने प्रकट हो बताया कि यह दोनों मुनिश्रेष्ठ मेरे द्वारा भेजे गए थे। हे नंदी! आपका यह शरीर लौकिक नहीं है, आप दिव्य पुरुष हो, आप अजर- अमर, दुख से हीन रहोगे। तुम मेरे प्रिय गणेश्वर हो व मेरे ही समान तेज व पराक्रम से युक्त हो।
-डा. अजय शुक्ल, श्रीबैकुंठनाथ पवहारि संस्कृत महाविद्यालय।

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