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सावन भगवान शिव का महीना है। इसी माह में श्रावण शुक्ल पंचमी को नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार नागों के प्रति हमारे सम्मान का प्रतीक है। पृथ्वी का भार यही वहन करते हैं। भगवान विष्णु की शैय्या बनते हैं और भगवान शिव के गले का हार। इसीलिए तो भगवान शिव नागेंद्रहार कहलाते हैं। अनेक विषधर नाग सदा उनके शरीर की शोभा बढ़ाया करते हैं। नमोस्तु सर्पेभ्यो ये के च... आदि अनेक ऋचाओं द्वारा नागों की स्तुति एवं पूजा का विधान है। वाराह पुराण में इस उत्सव के आरंभिक इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया गया है कि आज के ही शुभ दिन सृजन शक्ति के अधिष्ठाता ब्रह्माजी ने अपने प्रसाद से शेषनाग को विभूषित किया था और उनके द्वारा पृथ्वी को धारण कर अपनी अमूल्य सेवा देने के लिए जनता ने उनका अभिनंदन किया था। उसी समय से यह त्योहार नाग जाति के प्रति श्रद्धा का प्रतीक बन गया। भारतीय संस्कृति में नागों को प्रारंभ से ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस समस्त पृथ्वी का गुरुतर भार जिसने अपने ऊपर धारण किया हुआ है वह कोई अन्य नहीं बल्कि एक नाग ही है, जिसे शेषनाग कहा जाता है। लोकरक्षक भगवान विष्णु इन्हें ही शय्या बनाकर विश्वभरण का महान कार्य संपादित करते हैं। अमृत लाभ के लिए किए जाने वाले समुद्र मंथन जैसे महान कार्य में नेवती (रस्सी) का काम चलाने के लिए नागराज वासुकी द्वारा अपना शरीर समर्पित करना पुराण प्रसिद्ध कथा है। देवमाता अदिति की सगी बहन कद्रू के पुत्र होने के नाते नाग देवताओं के छोटे भाई हैं।
-रामकेश्वर तिवारी, श्रीबैकुंठनाथ पवहारि संस्कृत महाविद्यालय

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