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भगवान शिव अनादि हैं और आग के समान हैं। जल जाने का साहस हो तो ही शिव की शरण में जाना चाहिए। सच यह है कि जो शिव के पास गया वह जला और जो जला वही बचा भी, बाकी सब खो गए। शिव सभी संस्कारों को भष्मीभूत कर मनुष्य की आत्मा को निर्मल बना देते हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे जन्म के समय थी। ऐसी आत्मा जिस पर संस्कारों की कोई रेखा नहीं है, एकदम कोरा कागज। ऐसे क्रांतिद्रष्टा शिव को शत्-शत् नमन।
शिव के यहां कोई भेदभाव नहीं है। ऊंच-नीच, गरीब-अमीर सभी के लिए उनके दरबार में जगह है। जिनसे भेद होता है, शिव उसी को जलाते हैं, अर्थात वह भेदभाव को ही जलाते हैं। कहते हैं कि 'भेद भ्रम है, अभेद ब्रह्मÓ है। शिव परम ब्रह्म परमात्मा हैं। वह सबके पिता है और सभी का कल्याण करना उनका स्वभाव है। उन्हें अघोर कहा गया है, अघोर का मतलब जो घोर (जटिल) न हो, सहज व सुलभ हो। जो सबके साथ रह सकता हो और सबको स्वीकार कर सकता हो। जैसे गंगा शव व फूल में भेद नहीं करती, दोनों गंगा में समान रूप से बहते हैं, वैसे ही शिव के दरबार में मनुष्य अपनी सारी प्रवृत्तियों व विकारों के साथ शामिल हो सकता है। धीरे-धीरे शिव उन्हीं प्रवृत्तियों, संस्कारों और उन सभी अवयवों को जो मनुष्य के चरम विकास में बाधा हैं, उन्हें जलाकर खत्म कर देते हैं। वह करुणामयी हैं, इसीलिए उन्हें भोलेनाथ कहते हैं। वह कलयुग में अतिशीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। सावन मास शिव के नजदीक जाने का मास है। सावन को शिव का महीना माना गया है और सोमवार को शिव का दिन। इसलिए सावन मास में सोमवार का दिन शिव अर्चना के लिए बहुत ही खास है। यदि इस दिन शिव की अर्चना की जाए तो शिव का सानिध्य अतिशीघ्र प्राप्त होता है।
- आचार्य शरदचंद्र मिश्र, ज्योतिर्विद्

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