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पुराणों में शिव के बारह प्रकार के भिन्न सूर्यात्मक रूप की चर्चा मिलती है। कहा गया है कि आदित्यरूप भगवान शिव की अमृता नामक कला प्राणियों को जीवन प्रदान करती है, चंद्र नामक किरणें औषधियों की वृद्धि के लिए हिमवृष्टि का विस्तार करती हैं, शुक्ल नामक किरणें फसलों के पाक कारण रूप ऊष्मा का लोक में विस्तार करती हैं, हरिकेश नाम से प्रसिद्ध किरण नक्षत्रों को दीप्ति प्रदान करती है। इस प्रकार सूर्य रूपी भगवान शिव की ये किरणें संसार के प्राणियों का यज्न करती हैं। शिव की सोम नामक मूर्ति समस्त शांत किरणों की प्रकृति को प्राप्त है। काल पर शासन करने वाले उन शिव का सोमात्मक रूप सभी देहधारियों में शुक्र (वीर्य) रूप में व्यवस्थित है। चंद्र रूप शिव का स्वरूप सभी जीवों के मन में प्रतिष्ठित है। यह सोम नाम की उत्तम मूर्ति संपूर्ण प्राणियों के शरीर मे सोलह प्रकार के रूपों में अवस्थित है। वहीं शिव की यजमान नामक मूर्ति हव्य द्रव्यों से सभी देवताओं तथा कव्य द्रव्यों से पितरों को भी निरंतर संतृप्त करती है। यह मूर्ति आहुतिजन्य वृष्टि से सभी प्रकार के पदार्थों को उत्पन्न भी करती है। ब्रह्मांड के भीतर तथा बाहर व्याप्त जल तथा प्राणियों के शरीर में स्थित जल उन्हीं शिव की श्रेष्ठ मूर्ति है। यज्ञविग्रह में स्थित अग्नि भगवान शिव की श्रेष्ठ अग्निरूप मूर्ति ही है। जीवों के शरीर में जठराग्निरूप में ईश्वर शिव की कल्याणमयी मूर्ति ही विराजमान है। यह अग्नि मूर्ति अत्यंत पूजित है। यही हव्य व कव्य रूप में देवताओं व पितरों को संतृप्त करती है।
- साधना मिश्रा, श्रीबैकुंठनाथ पवहारि संस्कृत महाविद्यालय

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