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करोड़ों वर्ष पूर्व ब्रह्मांड में हुए धमाके से ग्रहों का निर्माण हुआ। ऋषि-मुनियों ने उसे नाद कहा, ऐसा नाद जिसका न आदि है और न अंत, यह प्रकाश व गति है। तंत्र शास्त्रों में प्रकाश व गति के रूप में शिव को संबोधित किया गया है। पुराणों के अनुसार धमाके से उत्पन्न अनहद नाद से तीन ध्वनियों- अ- ऊ- म अर्थात ऊं की उत्पत्ति हुई, इनसे तीन सत्ता का प्रादुर्भाव हुआ। अ से ब्रह्म व उनकी शक्ति सरस्वती, ऊ से विष्णु व उनकी शक्ति लक्ष्मी तथा म से शंकर और उनकी शक्ति काली। ऊं का उच्चारण करने वाला निर्विकल्प समाधि में चला जाता है। मस्तिष्क से चुंबकीय तरंगें निकलने लगती हैं जो ब्रह्मांड यानी शिव से संपर्क स्थापित करा देती हैं, शिव से संपर्क होते ही अहं का विनाश हो जाता है और मनुष्य निर्मल चित्त होकर शिव कृपा का अधिकारी बन जाता है। सावन माह में हरियाली व आर्द्रता से वायुमंडल आच्छादित रहता है, जिससे तरंगें तेजी से प्रवाहित होती हैं। शिव की कृपा सदैव समस्त सृष्टि पर बरसती रहती है। इस माह में उनकी उपासना से हमारी तरंगें उन तक आसानी से पहुंच जाती हैं और हम उनकी कृपा प्राप्त करने की पात्रता अर्जित कर लेते हैं। इसलिए इस समय ब्रह्मांड नायक शिव की उपासना से हमारे असाध्य रोग, कष्ट, दुख, पीड़ा व दरिद्रता का नाश हो जाता है। इसलिए सावन को शिव का माह कहा गया है।
-नूतन, सौरविद्

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