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शिव क्या हैं? इसको जान लेना शिव कृपा पर ही अवलंबित है। वस्तुत: इसे जानना ही शिव का साक्षात्कार कर लेना है, जो बहुत दूर की बात है। फिर भी साधारण ज्ञान के लिए इतना जान लेना आवश्यक है- 'जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है, वह शिव हैं। जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलमय भगवान शिव हैं। जो सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही करुणा सागर भगवान शिव हैं। जो नित्य, सत्य, जगदाधार, विकार रहित साक्षी स्वरूप हैं, वे ही शिव हैं।Ó परात्पर, सच्चिदानंद परमेश्वर शिव एक हैं। वे विश्वातीत हैं और विश्वमय भी हैं। वे गुणातीत हैं और गुणमय भी हैं। वे एक ही हैं और अनेक रूपों में बने हुए हैं। शिव तामसी नहीं हैं, यह बाह्य दृष्टिवाले सांप्रदायिक आग्रही मनुष्यों द्वारा पैदा किया गया भ्रम है। भगवान शिव की यह विशेषता है कि वह बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामना पूर्ति के समय भोले बन जाते हैं। परन्तु जब संहार का अवसर आता है तब रुद्र रूप बनते भी उन्हें देर नहीं लगती। भगवान शंकर को भोलानाथ मानकर ही लोग उन्हें गंजेड़ी, भंगेड़ी, बावला, औघड़ आदि कह देते हैं। भक्त अनुराग में कोई भी आरोप लगा सकता है और शिव इसे सहर्ष स्वीकार भी करते हैं। शिव का श्मशान निवास, उनका विषपान बहुत गहरे रहस्यों को अपने अंदर समेटे हुए है। जिसे शिव की कृपा से शिव भक्त ही समझ सकते हैं। शिव भक्त को सदाचारपरायण रहकर नशे व दुराचरण से दूर रहना चाहिए। यही भगवान शिव का आदेश है।
-लालमणि तिवारी, उत्पाद प्रबंधक, गीताप्रेस

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