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समस्त लोक के एकमात्र संहारक, रक्षक व समग्र जगत के एक मात्र स्रष्टा पंचब्रह्मरूप शिव ही हैं। यही पंचब्रह्म नामक पांच श्रेष्ठ मूर्तियां संसार में प्रतिष्ठित हैं, जो क्रमश: ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव, सद्योजात आदि नामों से जानी जाती हैं। यही ईशान आदि मूर्ति रूप पंचब्रह्मात्मक रूप में संपूर्ण चराचर जगत के रूप में अवस्थित हैं। तत्वदर्शियों ने तो कहा है कि इस जगतप्रपंच में पचीस तत्वों से युक्त जो कुछ भी दिखाई देता है वह पंचब्रह्मरूप शिव ही हैं। ईशान, शिव की पहली मूर्ति है, जो भोग के योग्य समस्त प्रकृति वर्ग का भोग करती है। मुनियों ने प्राणियों के स्वामी प्रभु ईशान को शब्दतन्मात्रारूप कहा है और विस्तार के साथ उत्पन्न होने के कारण आकाशरूप अद्भुत आदिदेव शिव को ईशान बताया है। तत्पुरुष, शिव की दूसरी मूर्ति है। इसे परमात्मा की गुहास्वरूपिणी प्रकृति ही समझना चाहिए। भगवान तत्पुरुष त्वचारुप से जीवों के शरीर में विराजमान रहते हैं तथा विद्वानों के द्वारा पाणि-इंद्रियरूप से जीवों के शरीर में अवस्थित हैं। मुनिश्वरों ने भगवान तत्पुरुष को स्पर्शतन्मात्रारूप में ब्यवहृत किया है और उन्हें वायु को उत्पन्न करने वाला बताया है। यही तत्पुरुष शिव समस्त लोक में पवन रूप में व्याप्त हो प्राणिमात्र का कल्याण कर रहे हैं। अत: अपने कल्याण की कामना करने वाले मनुष्यों को पचीस तत्वों से युक्त विग्रह वाले पंचब्रह्मात्मक शिव की आराधना अवश्य करनी चाहिए। इसी तरह अघोर, वामदेव व सद्योजात नामक शिव की मूर्तियां परम कल्याणकारी हैं।
-डॉ. योगेश चतुर्वेदी, प्राचार्य, श्रीबैकुंठनाथ पवहारि संस्कृत महाविद्यालय

Keywords: shiv, savan

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